Saturday, September 1, 2007

बच्चों के भविष्य के लिए इंग्लिश मीडियम जरूरी है !!

बच्चों के भविष्य के लिए इंग्लिश मीडियम जरूरी है !!

यह मुझे अहसास हुआ जब मैं सन् 2003 में चर्म रोग विषेशग्य् के रूप मैं काम करने मुम्बई पहुंचा .
मैं शुरू से ही हिन्दी माध्यम के सरकारी टाट पट्टी स्कूलों का विध्यालयों का विध्यार्थी रहा मेहनती था इसलिए उत्तरोत्तर बढते हुए एक दिन जब आयुर्विग्यान महाविध्यालय मां पहुंचे तो चारों तरफ अंग्रेजी में गिटर पिटर करने वालों की भीङ थी ,पर हमें कोई असुविधा नहीं हुई कि हमारा हिन्दी भक्तों का एक पूरा समूह था जो आग्रह पूर्वक हिन्दी में ही बात करना पसन्द करता था.
M D (SKIN) करने के बाद जब मुम्बई की तरफ रूख किया तो कभी ऐसी कोई असुविधा नहीं हुई पर मन में एक शंका सी रहती थी ,कभी अंग्रेजी नहीं बोल पाना मेरी कमजोरी नहीं समझ ली जाए.और एक दिन वही हुआ जिसका मुझे डर था,एक दिन एक वृद्ध गुजराती महिला एक परिचारिका और अपनी पुत्र वधू के साथ दिखाने को आई परिचारिका ने अंग्रेजी में बोलना शुरु किया तो मैंने क्रमशः वृद्धा और फिर उसकी पुत्र वधु की तरफ देखा पर वे तो उससे भी धांसू निकली,अब अपनी हालत पस्त हो चली थी मेंने जैसे तैसे स्थिति को संभाला उन्हें दवाईयां वगैरा समझाई और उन्हें विदा किया.अपनी प्रेक्टिस के शुरुआत में यह मेरे लिए एक बङा झटका था .मुझे मेरा भविष्य अचानक से अंधकार मय लगने लगा मेरा हिन्दी प्रेम धूमिल हो रहा था, और तब मुझे अहसास हुआ कि इस देश में हिन्दीभाषी रह पाना इतना आसान नहीं ,
में मुंह लटकाकर घर पहुंचा ,तो धर्मपत्नी (जो कि अध्ययन पर्यन्त कॉन्वेन्ट में पढी थी) ने पूछा क्या हुआ तो मैंने सारा स्थिति का वर्णन किया, तो वह हंस पङी और बोली कि कोइ खास बात नहीं है अंग्रेजी बोलना तो चुटकियों का खेल है आज से हम सिर्फ इंग्लिश में बात करेंगे , खैर मैंने उसी समय से संकल्प लिया कि मैं अंग्रेजी पर अपना अधिकार बढाउंगा पर मेरा हिन्दी प्रयोग जारी रहेगा. उसके बाद से मैनें घर पर सिर्फ अंग्रेजी बोलना शुरू कर दिया और ये सोच लिया कि चाहे जितनी कठिनाइ हो यदि सामने वाला व्यक्ति जिस भी भाषा में बोलने वाला हो में उसी में बात करुंगा.
MBBS और. MD हमने अंग्रेजी माध्यम से ही पढी पर चूंकि कभी सामान्य बोलचाल का अंग नहीं रही, इसलिये प्रारम्भ में थोडी कठिनाई हुई पर, मात्र एक डेढ महिने के प्रयास के बाद मैं अब अधिकार पूर्वक होकर अंग्रेजी बोल रहा था. पर इसका एक सबसे अच्छा प्रभाव ये हुआ कि मेरा हिन्दी बोलने आत्म विश्वास बढ गया.
एक चर्म रोग विशेषग्य होने के नाते अंग्रेजी भाषियों से उन्हीं की भाषा में संभाषण भी करना पङता है,.पर अब जबकि में स्वयं शुरुआत ही हिन्दी में करता हुं तो सामने वाला भी ये जानता होता है कि डॉक्टर इंग्लिश जानते है,तो करीब करीब जवाब भी हिन्दी में ही मिलता है .
मेरे इस अनुभव ने मुझे बहुत ने सी चीजों के बारे में सोचने को विवश कर दिया कि क्यों स्वतन्त्र भारत में भी अपनी भाषा बोलने के लिए भी संघर्ष पडता है ,दूसरे अधिसंख्य जनता का ये सोचना कि अंग्रेजी माध्यम में पढने मात्र से आपके बच्चे का केरियर कुलांचे भरने लगेगा कितना हास्यास्पद लगता है.क्यों कि आगे आपका बच्चा क्या करने वाला है यह ईस बात पर निर्भर करता है कि उसे क्या आता है ना कि उसे किस भाषा मै आता है .
पढाई करते समय बच्चों की अधिकांश ऊर्जा विषय को समझने (जो कि अपनी मातृ भाषा में आसानी से कर सकता है)की बजाय ऊसे रटने में लगाता है.
जिस दिन सुबह उठकर आप को लगे कि अंग्रेजी सीखनी ही पङेगी तो आपको अधिकतम 2 सहिने लगते हैं तो क्या इसके लिए पूरी पढाई दांव पर लगाना कहां कि अक्लमंदी है.कम से कम मेरा अनुभव तो यही कहता है.

4 comments:

विपुल said...

यह हमारा दुर्भाग्य है, चीन, रूस से हमें कुछ सीखना चाहिए

विपुल
एम डी पीड्यैटरिक्स

Shastri JC Philip said...

आप ने काफी महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है. सही नीतियां हों तो चीन रूस, जापान, कोरिया, इस्रायेल इत्यादि के समान हिन्दुस्तान में हर विषय भारतीय भाषाओं मेम पढाया जा सकता है -- शास्त्री जे सी फिलिप

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
इस विषय में मेरा और आपका योगदान कितना है??

DR PRABHAT TANDON said...

आपकी बात से मै भी बिल्कुल सहमत हूँ , हिन्दी भाषी प्रदेशों मे तो आसानी से काम चल जाता है लेकिन दूसरे प्रदेशों मे यह एक अल्प ज्ञान सा लगता है । अब चाहे इसको हमारे देश की मानसिकता कहें या यह हमारी विवशता , यह एक बहुत ही दु:ख भरी स्थिति है , और देशों से सबक हमको अवशय लेना चाहिये जहाँ अपनी मातृभाषा अपना के वह कहाँ से कहाँ पहुँच गये ।

Shrish said...

आपने एकदम सही विचार प्रकट किए। हिन्दी प्रेम अपनी जगह है पर वर्तमान में कैरियर के लिए अंग्रेजी आना जरुरी है। जब भी कहीं इंटरव्यू के लिए जाता हूँ तो सामने वाला पूर्ण रुप से आंग्ल भाषा में बात करता है, उस समय मैं हिन्दीप्रेम का भाषण नहीं दे सकता। ये अलग बात है कि कुछ दिन बाद वही व्यक्ति हिन्दी में ही बात करने लगता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो अंग्रेजी गेटपास है।

हाँ यह अवश्य है कि ये सब दुर्भाग्य का विषय है।

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