Thursday, September 13, 2007

गर्मी के मौसम में त्वचा की देखभाल-2

गर्मी के मौसम की एक प्रमुख समस्या रिंगवर्म है,जिसे सामान्य भाषा में दाद भी कहते हैं, इसका तकनीकि नाम टीनिया हैय.शरीर में किस अंग पर ये होता है उस हिसाब से इसके अलग अलग नाम हो सकते हैं.जैसे Tinea corporis(शरीर ),T capitis(सिर में),T.pedis(पांव पर),T.manum(हाथ में),Tinea cruris कहते हैं Onychomycosis(नाखुन में  )इत्यादि विभिन्न नामों से जाना जाता है.उइसको रिंवर्म इसलिए कहते हैं कि जब यह शरीर पर पूरी तरह बन जाता है ,तो इसका बाहरी हिस्सा एक उभरे हुए गोले की तरह दिखाई देता है.इसको dhobi itch भी कहते है जो कि अंग्रेजों के जमाने में धोहबियों के के कपङे गीले रहने की वजह से हो जाती थी तो उनकी अंग्रेज साहबों द्वारा दिया गया नाम है.

अधिकतम मरीजों में यह काछों(Groin) में में होता जिसे Tinea cruris कहते हैं .अक्सर गरमि ओर नमी के मौसम में छोटे छोटे लाल रंग के लाल रं के निशान जैसे बनते हैं जो धीरे धीरे बङे बङे होते चले जाते हैं .ये निशान बङे होने के साथ अन्दर से साफ होते जाते हैं और अंततः एक गोला बन जाता है जिसके लिए इसा रिंग वर्म कहते हैं इसमें .जबरदस्त खुजली चलती है और जलन होती है .इस समय यदि उपचार नहीं लिया जाये तो फिर यह धीरे धीरे फैलता हुआ काफी दूरी तक फैल .बाकी शरीर पर तो ये एक ही प्रकार का होता है पर कई बार

तक  अक्सर इस समय मरीज बाजार में तुरन्त आराम का दावा करने वाली कोई न कोई दवा खरीदकर लगा लेते हैं जो कुछ समय तक तो आराम देती है पर उस के बाद समस्या को बढाना शुरू कर देती है.जैसा पहले

Tinea cruris---काछों में होने वाला फंगल संक्रमण,दोनों तरफ एक साथ होता है.गर्मी ओर नमी हो और यदि गाढे कपङे पहने जाएं तो इस रोग के होने की आदर्श स्थिति है.जलन और खिजली कई बार इतना अधिक होती है कि यहां से छिल जाता है और भयंकर जलन करता है .अक्सर 10-12 साल की आयु के बाद होता है.

Tinea capitis--सिर के बालों में होने वाला  कवक संक्रमँ ,12 वर्ष  से कम उम्र के बच्चों के ये होता है,दिखने में यह बालों में एकदम रूसी जैसा दिखाई देता है,पर ध्यान रहे बच्चों में होने वाली सामान्य रूसी को भी टी केपिटिस की रह उपचार किया जाता है.क्यों कि अधिकतम बार रूसी के रूप में टीनिया ही होता है.कई बार यह जीवाणु संक्रमण के कारण काफी सूज जाता है तब इसे kerion कहते हैं यह थोङी मुश्किल चीज होती है और समय पर तरीके से उपचार नहीं किया गया तो यह बङा घाव कर देती है.उपचार समय पर करने के बाद भी कऊई बार बाल वापिस नहीं आते, इसलिए बच्चों में यदि रूसी दिखाइ दे तो तुरन्त चर्म रोग विशेषग्य से संपर्क करना चाहिए.

 

Onychomycosis---नाखून में हीने वाला संक्रमण अधिकतर हाथ की अंगुलियों में होता है.वे लोग जिनके हाथ लम्बे समय तक गीले रहते हैं जैसे गृहिणियां ,होटल रेस्टोरेन्ट पर काम करने वाला,पशुपालक इत्यादी,नाखून के आस पास त्वचा की जो खांच(nail fold) बनी होती है वह सूज जाती है और उसमें मवाद आने लगती है,

Tinea barbae पुरूषों के दाढी में होने वाले सेक्रमँण को tinea barbae  कहते हैं.इसमें भी जबरदस्त सूजन आकर मोटी मोटी मवाद वाली गांठें  हो जाती है.और खींचने मात्र से बाल बाहर आ जाते हैं

उपचार और सावधानिया अगले अंक में

Wednesday, September 5, 2007

गर्मी के मौसम में त्वचा की देखभाल -1

हमारे देश में अधिकतम हिस्सों में सालभर में 4 से 8 महिने खूब गर्मी पङती है और जहां बरसात की अधिकता होती है वहां ऊमस भी खूब रहती है ,ऐसे में घमोरियां,फंगल इंफेक्शन(दाद),फोङे फुंसियां आदि अनेक   समस्यायें ऐसे मौसम में होती रहती है,ऐसे में यदि थोङी बहुत त्वचा की देखभाल की जाए तो इस तरह की बहुत सी समस्याओं से बचा जा सकता है.हम एक एक कर ऐसी समस्याओं के बारे में बात करेंगे,

घमोरियां---  तेज गर्मी और ऊमस के समय  1 -2 मि.मि. के लालिमा लिए हुए छोटे-छोटे दाने पूरे शरीर पर विशेष कर कपङे से ढके हुये स्थानों और रगङ लगने वाले स्थानों (intertriginous areas like groin and axilla) जैसे काछों और काखों में  निकल आते हैं.और इस वजह से  असहनीय खुजली और जलन होती है.इन्हें सामान्य बोल-चाल की भाषा में घमोरियां,अळाईयां या तकनिकी भाषा में milliaria rubra कहते हैं.

तेज गर्मी और ऊमस के समय  जब पसीना उत्सर्जित करने वाला स्वेद कोशिकाओं को अत्यधिक पसीना उत्सर्जित करना पङ रहा हाता है उसी समय staphylococcus epidermidis नामक जीवाणु वहां वृध्दी करने लगता है,और अंततः वह इस ग्रन्थी की नलिका को बन्द कर देता है जिससे न स्वेद बिन्दु अब सहजता पूर्वक  बाहर नहीं निकल पाते और नलिका में सूजन पैदा कर देते जो कि बाहर से रक्तिम बिन्दु जैसी दिखाई पङती है.और जब यह पूरे शरीर पर फेली होती है तो जबरदस्त खुजली और जलन का कारण होती  है.बकई बार ज्यादा  खुजली करने फोङे फुंसियां भी हो जाती हैं.

 बचाव और उपचारृ --सबसे जरूरी तो यह है कि यथासम्भव ठंडे और हवादार स्थान पर रहा जाए,पर कई बार जैसे यह सम्भव नहीं हो पाता तो ठंडे पानी और नमक की पूर्ती शरीर में भरपूर होनी चाहिए.वस्त्र ढीले ढाले और पतले कपडे के हों,इसके अतिरिक्त दिन में हो सके दो बार ठंडे पानी से नहाना चाहिए .सुबह  नहाने के बाद साधारण टेल्कम पावडर लगाना चाहिए इससे पसिना जल्दी सोखा जाता है, यदि फिर भी  घमोरियां हो जाएं तो प्लास्टिक की थैली में बर्फ लपेटकर सेक करने से काफी लाभ हो सकता है .

हो गइ और टेल्कम पावडर स् आराम नहीं आ रहा हो तो केलामिन लोशन जो बाजार में caladryl,calosoft,lacto calamine इत्यादी विभिन्न नामों से मिलते हैं ,से काफी लाभ होता है.इन सब चीजों से भी आराम नहीं आता है तो चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए.

अगले अंक में हम फंगल इंफेक्शन याने दाद के बारे में बात करेंगे.

 

 

 

 

 

 

 

 

Saturday, September 1, 2007

बच्चों के भविष्य के लिए इंग्लिश मीडियम जरूरी है !!

बच्चों के भविष्य के लिए इंग्लिश मीडियम जरूरी है !!

यह मुझे अहसास हुआ जब मैं सन् 2003 में चर्म रोग विषेशग्य् के रूप मैं काम करने मुम्बई पहुंचा .
मैं शुरू से ही हिन्दी माध्यम के सरकारी टाट पट्टी स्कूलों का विध्यालयों का विध्यार्थी रहा मेहनती था इसलिए उत्तरोत्तर बढते हुए एक दिन जब आयुर्विग्यान महाविध्यालय मां पहुंचे तो चारों तरफ अंग्रेजी में गिटर पिटर करने वालों की भीङ थी ,पर हमें कोई असुविधा नहीं हुई कि हमारा हिन्दी भक्तों का एक पूरा समूह था जो आग्रह पूर्वक हिन्दी में ही बात करना पसन्द करता था.
M D (SKIN) करने के बाद जब मुम्बई की तरफ रूख किया तो कभी ऐसी कोई असुविधा नहीं हुई पर मन में एक शंका सी रहती थी ,कभी अंग्रेजी नहीं बोल पाना मेरी कमजोरी नहीं समझ ली जाए.और एक दिन वही हुआ जिसका मुझे डर था,एक दिन एक वृद्ध गुजराती महिला एक परिचारिका और अपनी पुत्र वधू के साथ दिखाने को आई परिचारिका ने अंग्रेजी में बोलना शुरु किया तो मैंने क्रमशः वृद्धा और फिर उसकी पुत्र वधु की तरफ देखा पर वे तो उससे भी धांसू निकली,अब अपनी हालत पस्त हो चली थी मेंने जैसे तैसे स्थिति को संभाला उन्हें दवाईयां वगैरा समझाई और उन्हें विदा किया.अपनी प्रेक्टिस के शुरुआत में यह मेरे लिए एक बङा झटका था .मुझे मेरा भविष्य अचानक से अंधकार मय लगने लगा मेरा हिन्दी प्रेम धूमिल हो रहा था, और तब मुझे अहसास हुआ कि इस देश में हिन्दीभाषी रह पाना इतना आसान नहीं ,
में मुंह लटकाकर घर पहुंचा ,तो धर्मपत्नी (जो कि अध्ययन पर्यन्त कॉन्वेन्ट में पढी थी) ने पूछा क्या हुआ तो मैंने सारा स्थिति का वर्णन किया, तो वह हंस पङी और बोली कि कोइ खास बात नहीं है अंग्रेजी बोलना तो चुटकियों का खेल है आज से हम सिर्फ इंग्लिश में बात करेंगे , खैर मैंने उसी समय से संकल्प लिया कि मैं अंग्रेजी पर अपना अधिकार बढाउंगा पर मेरा हिन्दी प्रयोग जारी रहेगा. उसके बाद से मैनें घर पर सिर्फ अंग्रेजी बोलना शुरू कर दिया और ये सोच लिया कि चाहे जितनी कठिनाइ हो यदि सामने वाला व्यक्ति जिस भी भाषा में बोलने वाला हो में उसी में बात करुंगा.
MBBS और. MD हमने अंग्रेजी माध्यम से ही पढी पर चूंकि कभी सामान्य बोलचाल का अंग नहीं रही, इसलिये प्रारम्भ में थोडी कठिनाई हुई पर, मात्र एक डेढ महिने के प्रयास के बाद मैं अब अधिकार पूर्वक होकर अंग्रेजी बोल रहा था. पर इसका एक सबसे अच्छा प्रभाव ये हुआ कि मेरा हिन्दी बोलने आत्म विश्वास बढ गया.
एक चर्म रोग विशेषग्य होने के नाते अंग्रेजी भाषियों से उन्हीं की भाषा में संभाषण भी करना पङता है,.पर अब जबकि में स्वयं शुरुआत ही हिन्दी में करता हुं तो सामने वाला भी ये जानता होता है कि डॉक्टर इंग्लिश जानते है,तो करीब करीब जवाब भी हिन्दी में ही मिलता है .
मेरे इस अनुभव ने मुझे बहुत ने सी चीजों के बारे में सोचने को विवश कर दिया कि क्यों स्वतन्त्र भारत में भी अपनी भाषा बोलने के लिए भी संघर्ष पडता है ,दूसरे अधिसंख्य जनता का ये सोचना कि अंग्रेजी माध्यम में पढने मात्र से आपके बच्चे का केरियर कुलांचे भरने लगेगा कितना हास्यास्पद लगता है.क्यों कि आगे आपका बच्चा क्या करने वाला है यह ईस बात पर निर्भर करता है कि उसे क्या आता है ना कि उसे किस भाषा मै आता है .
पढाई करते समय बच्चों की अधिकांश ऊर्जा विषय को समझने (जो कि अपनी मातृ भाषा में आसानी से कर सकता है)की बजाय ऊसे रटने में लगाता है.
जिस दिन सुबह उठकर आप को लगे कि अंग्रेजी सीखनी ही पङेगी तो आपको अधिकतम 2 सहिने लगते हैं तो क्या इसके लिए पूरी पढाई दांव पर लगाना कहां कि अक्लमंदी है.कम से कम मेरा अनुभव तो यही कहता है.

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