कई बार सरकारें वाह वाही लूटने के लिए बिना सोचे समझे ऐसी नीतियां लागू कर देती है जिनसे अंततः फायदा होने की बजाय आम जनता को नुकसान ज्यादा होता है ,
उदाहरण के लिए राजस्थान में सरकारी चिकित्सालयों में चिकित्सकों को जैनेरिक नाम से दवाईयां लिखना अनिवार्य कर दिया गया है ,संभवतया यह डॉक्टरों को जो कंपनियां आर्थिक लाभ देती है इसके लिए किया गया था.पर इसका जो प्रभाव हुआ वह मूल रोग से भी अधिक कष्ट कारी रहा है,सबसे पहले तो सारी दवाईयों को जैनेरिक नाम से लिखा जाना संभव ही नहीं है,क्यों कि कई बार एक ही दवाई के 10-10 घटक होते हैं तो उन्हें उसकी डोज के हिसाब से लिखा जाये तो एक मरीज देखने में कम से कम 15 मिनिट चाहिअ और बाह्यः रोगी विभाग में प्रतिदिन 50 से 100 मरीज देखने वाला चिकित्सक कैसे यह कर पायेगा यह सोचने का विषय है,क्यों कि यह लगभग असंभव है,
इससे भी बङी समस्या है कि चिकित्सक ने औषधी लिख दी पर औषधी विक्रेता उसे क्या देगा वह चिकित्सक के हाथ में नहीं रहता है,आपकी जानकारी के लिए बता दूं की एक अच्छी कंपनी और एक चलताउ कंपनी के विक्रय लाभ में कई गुना का फर्क होता है और यही फर्क उनकी गुणवत्ता में भी होता है.इसलिए दुकानदारों की चांदी हो रही है क्यों कि अब यह चिकित्सक के हाथ में नहीं रह जाता कि उसके मरीज को किसी अच्छी कंपनी की अच्छी गुणवत्ता वाली औषधी ही मिले.खांसी जुकाम की तो कोई बात नहीं गंभीर रोगों से ग्रसित रोगियों का इससे क्या हाल होने वाला है ये आप कल्पना कर सकते है.मान लीजिये कोई हृदय रोगी या मधुमेह या के कोई लकवे से ग्रस्त रोगी की औषधियों की गुणवत्ता विश्वसनीय नहीं हो तो चिकित्सक किस तरह रोगी का उपचार कर पायेगा.आश्चर्य की बात तो यह है कि यह नियम जिला चिकित्सालय से लेकर आयुर्विज्ञान महाविद्यालय तक लागू है तो आप सोचिये गंभीर रोगियों का क्या हाल होता होगा.
सरकार की मंशा तो पता नहीं क्या रही होगी पर फिलहाल तो सरकार इस नियम को सख्ती से लागू कर रही है और नहीं मानने वाले चिकित्सकों के निलंबन से लेकर स्थानांतरण तक सरकार कर रही है.चिकित्सकों की तो वो जाने पर मरीजों का हाल तो भगवान भरोसे ही है.

