Sunday, December 12, 2010

चिकन पोक्स (chicken pox)

चिकन पोक्स एक बहुत ही संक्रामक बीमारी है  जो कि varicella zoster नामक विषाणु(virus) के संक्रमण से होता है.जिसमें छोटे छोटे छाले(vesiclec) पूरे शरीर पर बन जाते हैं,जो कि विभिन्न् रूपों मैं हो सकते हैं जैसे छोटे छाले.लाल दाने(papules),खुरंट(scab) इत्यादि..ये विषाणु दो प्रकार की बीमारियां हमारे शरीर मैं कर सकता है.चिकन पोक्स और herpes zoster.चिकन पोक्स को   जिसे भारत मैं विभिन्न नामों से जाना जाता है,जैसे छोटी माता,अचबङा इत्यादी . 

संक्रमण का तरीका- विषाणु अति संक्रामक हो ता है.तथा किसी संक्रमित व्यक्ति के उच्छ्वशन मैं निकली वायु के अंदर उपस्थित जल कणों(droplet infection) के अंदर  ये  उपस्थित होते हैं.और ऐसें मैं रोगी अपने आसपास आनेवाले किसी भी व्यक्ति को संक्रमित कर सकता है.  इसके अलावा ये मरीज के शरीर पर उपस्थित खुंरट या छालों में उपस्थित पानी के संपर्क मैं आने से भी संक्रमित हो सकता है.पर उच्छवसित वायु मैं उपस्थित विषाणु ही मुख्य रूप से चिकन पोक्स को फैलाने के लिए जिम्मेदार होता है.

लक्षण-5 से 9 वर्ष तक के बच्चे सबसे ज्यादा  संक्रमित होते हैं.चिकन पोक्स का incubation period (संक्रमित होने के बाद से लेकर बीमारी प्रकट होने तक लगने वाला समय) 10 से 21 दिन तक होता है और ज्यादातर ये 14 से 17 दिन तक ही होता है.रोगी शरीर पर छाले प्रारंभ होने के 48 घंटे पहले से लेकर जब तक सारे छालों पर खुरंट आने तक रोगी संक्रामक होता है…और ये इतना ज्यादा होता है कि पहले से असंक्रमित सामान्य जन मैं से लगभग 90 प्रतिशत तक संक्रमित हो जाते हैं.image

     प्रारंभ मैं मरीज को हल्का फुल्का बुखार जो कि बाद मैं तेज भी हो सकता है,शरीर मैं दर्द,थकान,सरदर्द,,प्रारंभ होने के बाद रोगी को छोटे छोटे लाल निशान उभरने लगते हैं जो कि घंटों के हिसाब से बढने लगते हैं और पूरे शरीर पर फैल जाते है .ये लाल निशान धीरे धीरे छोटे छाले जो कि 2-3 मि मि तक हो सकते हैं धीरे धीरे लगभग 5-10 मि मि तक हो जाते.जैसा कि ऊपर वाले चित्र मैं दिखाया गया है ये छाले चारों और से एक रक्तिम वलय द्वारा घिरे रहते हैं.  धीरे धीरे एक दो दिन मैं इनके अंदर का पानी सूख कर ऊपर खुरंट का रूप ले लेता है.ये छाले एक के बाद एक समूह मैं होते हैं.याने की एक ही समय मैं रोगी के शरीर पर प्रारंभिक लाल दाने,छोटे छाले,बङे छाले,और खुरंट सब एक साथ देखे जा सकते हैं.इन छालों मैं द्वितीयक कीटाणु (secondary bacterial infection)संक्रमण भी हो सकता है जिससे साफ द्रव वाले इन छालों मैं मवाद भी पङ सकती है. .ये छाले या निशान मुंह गले व योनि की श्ललेष्मा झिल्ली पर भी हो सकते हैं.रोग की गंभीरता अलग अलग हो सकती है कुछ लोगों मैं छोटे मोटे निशान और छाले बनकर पांच चार दिन मैं ये ठीक हो जाते है और कई बार ये अपने गंभीरतम रूप मैं प्रकट होते हैं जिसमें पूरे शरीर पर बङे बङे झाले और खुरंट फैल जाता है और  उनमें मवाद भी पङ सकती है.सामान्यतया रोग की गंभीरता जितनी छोटी आयु होती है उतनी कम होती है अधिक आयु मैं और विशेष कर वृद्धावस्था मैं ये बहुत गंभीर रूप ले सकती है.

parinatal vericella-जब किसी गर्भवती महिला के बच्चे के जनम से चार पांच दिन पहले से लेकर 48 घंटे बाद तक ये संक्रमण होता है तो ये बहुत ही खतरनाकर माना जाता है क्यं कि उस समय मैं बच्चे की इस विषाणु के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं होती है और इस समय मां मैं या बच्चे मैं संक्रमण के बाद मृत्युदर 30 प्रतिशत तक हो सकती है.

ऐसे लोग जिनमें किसी भी वजह से रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है जैसे कैंसर के रोगी,गुर्दा प्रत्यारोपण किये हुए लोग,संक्रमित व्यक्ति को इन लोगों से आवश्यक रूप से दूर रखना होता है नहीं ये बहुत ही घातक सिध्द हो सकता है.

उपचार-इस रोग के निदान के लिए किसी विशेष जांच की आवश्यकता नहीं पङती है क्यों कि रोगी के लक्षण ही स्वयं इतने मुखर होते हैं कि देखते ही पता लग जाता है.

चूंकि ये एक विषाणु जनित रोग है और ये एक ऐसा रोग है जिसके लिए एंटी वायरल दवाईयां उपलब्ध है. नकी मात्रा और यथा-

एसाईक्लोविर(aciclovir)-एक वयस्क व्यक्ति के लिए (लगभग 50 किलो के व्यक्ति के लिए)-800 मि ग्रा हर चार घटे मैं याने की 800 मिग्रां 5 बार प्रतिदन

,फैमसिक्लवोविर(Famciclovir)-500 मिलिग्राम कम से कम दिन मैं तीन बार सात दिन के लिए

,वेलासाईक्लोविर(valaciclovir )-1 ग्राम प्रति दिन तीन बार सात दिन के लिए

ये दवाईयां विभिन्न् कंपनियों की अलग अलग नामों से बाजार मैं मिलती है .देखने मैं इन दवाईयों की मात्रा बहुत ज्यादा दिखाई देती है जैसा कि एसाईक्लोविर जो कि प्रतिदिन 4 से 5 ग्राम तक दी जाती है पर केवल इसी अनुपात मैं लेने पर मरीज को लाभ मिलता है.ये दवाइयां बहुत मंहगी भी आती है जैसे किसी भी व्यक्ति का उपचार एक हजार से पंद्रह सौ रुपये के बीच होता है.पर फिर भी आगे आने वाली जटिलताओं को देखते हुए ये रकम ज्यादा नहीं है,

जटिलताएं-जैसा कि पहले ही बताया गया है कि किसी भी व्यक्ति मैं जिसमें इस रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता नहीं होती या बहुत कम होती है जैसे कि गुर्दा प्रत्यारोपण कराये हुए व्यक्ति,कैसंर रोगी,या parinatal varicella जैसा ऊपर बताया ग्या है तो ये संक्रमण जानलेवा हो सकता है.इसके अलावा parinatal pneumonia व varicella encephalitis(मस्तिष्क ज्वर) आदि प्राण घातक सिद्ध हो सकती है.इसलिए इसका उपचार यथाशीघ्र लेना आवश्यक होता है.पर फिर भी सबसे अधिक पाई जाने वाली complication इसके छालों के बाद होने वाले निशान(pock scar) होते है जो किसी भी व्यक्ति का चेहरा बिगाङ सकते हैं.ये 1से 10 मिमि के गोल गोल खड्डे जैसे निशान होते है जिनका आधार काला हो जाता है और चेहरे को भद्दा बना सकता है,इस पर एक बार हो जाने के बाद इनका ठीक होना बहुत ही कठिन होता है या फिर ये जीवन भर के लिए आप के सुंदर चेहरे पर गंदे से निशान छोङ देता है.

भ्रांतियां-आज भी ये भ्रांति सामान्य जन मैं व्याप्त है कि चिकन पोक्स जैसी बीमारी माता का प्रकोप होता है और इसका इलाज होने पर माता रूठ जाति है.और इसका इलाज भले भले लोग याने अच्छे पढे लिखे लोग झाङ फूंक से करवाना पसंद करते हैं.और कोई आश्चर्य नहीं क्यों कि ये लोग झाङ फूंक से ठीक भी होचाते  हैं इसका कारण है कि इस संक्रमण का प्रकोप पांच सात दिन रहता है तो आप चार पांच दिन झाङ फूंक करवायेंगे या के नहीं करवायेंगे ये ठीक होने ही वाली है.ये संक्रमण जीवन मैं मात्र एक ही बार होता है.समय पर यदि उपचार ले लिया जाये तो इससे होने वाली जटिलताएं कम हो जाती हैं या फिर बिल्कुल भी नहीं होती है.जैसे यदि समय पर उपचार ले लिया जाये तो कम से कम आप का चेहरा खराब होने से बच जाता है.

.जैसा कि प्रथम पैराग्राफ मैं लिखा गया था हरपीज जोस्टर(herpes zoster) भी इसी विषाणु के संक्रमण से होता है.वास्तव मैं ये चिकन पोक्स का ही द्वितीयक स्वरूर होता है जो कि उन लोगों के होता है जिनको जीवन मैं कभी न कभी चिकन पोक्स हो चुका होता है .और ये विषाणु शरीर की किसी एक नस मैं जमा होता है जो कि जीवन मैं हरपीज जोस्टर के रूप मैं पुनःप्रकट होता है जिसके बारे मैं अगली पोस्ट जानेंगे.

Wednesday, August 18, 2010

एकने व्ल्गेरिस --ऊपचार +सामान्य chaarcha

एक्नी के बारे कारण के बारे में सामान्य जानकारी हमने प्राप्त की, इसके बाद अब हम इसके ईलाज के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे .
एक बार हम ईसके विभिन्न पहलुऔं पर नजर डाल लेते हैं ,
मरीज के चेहरे पर चिकनाई यानि सीबम की अधिकता होती
संक्रमण हो सकता है
कीलें और सूजन हो सकती ,जो की समय निकलने के साथ चेहरे पर निशान छोङ देती है ,
ईलाज मूख्यतः इन्ही बातों को ध्यान में रखकर किया जाता है .
एक्नी के ईलाज में प्रारम्भ में खाने और लगाने दोनों प्रकार की औषधियों का उपयोग किया जाता है.जिन्हें बाद में धीरे धीरे कम किया जाता है .
खाने की औषधियां---
एन्टिबायोटिक्स यथा डॉक्सीसाईक्लिन,एजिथ्रौमाईसिन,मिनोसाईक्लिन आदि .
अन्य औषधियां जैसे जो कभी कभी काम आती हैं पर बहुत उपयोगी होती हैं जैसे जिंक सल्फेटो,हार्म हार्मोन्स,दर्द निवारक,स्टीरॉयड्स आदि .
लगाने की औषधियां इस तरह की दवाईयों को हम तीन हिस्सों में बांट सकते ,
दवाईयां जो मुख्यतया कीलों पर काम करती हैं जैसे –एडॅपलीन(एडॅफरीन,डॅरिवा,मॅडापाईन )ट्रिटिनॉइन, (रेटिनॉ),एजिलिक एसिड,
दवाईयां जो मुख्यतया जीवाणु प्रतिरोधी होती हैं जैसे –बेन्जॉयल परॉक्साइड, एजिलिक एसिड, क्लिन्डामाइसिन,इरिथ्रोमाइसिन,टेट्रासाइक्लिन,इत्यादि.
दवाईयां जो मुख्यतया सुजन कम करती हैं. जैसे- ग्रुप 2 की सारी दवाईयां ये दुवाईयां और ग्रुप 1 से एङॅपलीन इन दवाईयों का एक काम संक्रमण और सूजन दोनों कम करना है .
कोष्ठक में दिये गये नाम इन दवाईयों के प्रचलित ट्रेड नेम हैं.
ये दवाईयां यहां मात्र परिचय के लिये दी गई हैं वास्तविक उपयोग के लिए हमें डॉक्टर से ही परामर्श करना चाहिए .
उपचार दो चरणों में किया जाता है .पहले चरण में फुंसियों को जल्दी से जल्दी नियन्त्रित करना जिससे कि संभावित स्कारिंग (निशान) कम से कम हों . और दूसरे बाद में कम से कम दवाईयों से इन्हें ठीक रखना,
चूंकि यह समस्या कई महिनों या सालों तक भी चल सकती है तो ईलाज चालू करने से पहले हम ये समझ लें कि यह कई महीनों तक भी खिंच सकता है तभी ईसका सही लाभ होता है .अक्सर हम लोग जैसे ही थो इन दवाईयों एक्नी ङा आराम आता है उपचार बन्द कर देते हैं इससे जब फिर से फुसिंयां जब बढती है तो हमें फिर से खूब सारी दवाईयां खानी पङती है,अन्यथा ऐकाध लगाने वाली दवाई से भी उपचार सम्भव है । औषधियां
क्यों कि पिम्पल्स एक सर्वसामान्य समस्या है इसलिए हमारे आस पास अनेक स्वायम्भू विशेषग्य मिल जायेंगे और ईसी लिए शायद इतनी सारी भ्रान्तियॉ प्रचलित हैं इनका निवारण भी अति आवश्यक है ।
खाने में कुछ विषेश लेने की या छोङने की आवश्यकता नहीं होती आप जैसा भी ले रहें हैं वैसा पौष्टिक भोजन लेते रहें.खासकर तली हुई चीजों के बारे में विषेश पूर्वाग्रह होता है जिनके खाने या छोङने से ज्यादा फर्क नहीं पङता .
बार बार मुंह धोने से फायदे की बजाय नुकसान ज्यादा होता है,
चेहरे पर दवाईयों के अलावा अन्य क्रीम वगैरा लगाने से परहेज करें ,क्यों कि चिकनाइ लगाने से फुसिंया बढती है .


शेस आगले अंक में -ईलाज से अधिकतम फायदा कैसे हो

Saturday, February 27, 2010

होली खेलते समय कुछ ध्यान देने योग्य बातें….

11682_BnHover  कैमिकल रंगों से होली नहीं खैलनी चाहिये …ये आपको तो पता है पर जरूरी थोङी है सामने वाले को भी पता है….यहां कुछ छोटी छोटी सामान्य सावधानियां है जिनसे हम होली के बाद अपनी त्वचा को काफी हद तक सामान्य रख पा सकते हं…

  1. जहां तक हो सके कैमिकल से बने रंगों का प्रयोग न करें….क्यों कि ये सामने वाले के साथ साथ आपकी त्वचा को भी नुकसान पहुंचा सकता है….
  2. holi_rangयथासंभव अपने बालों मैं तेल लगाकर रखें(आप छछूंदर न सही पर चमेली का तेल तो लगा ही सकते है) ….क्यों कि तेल लगे हुए बाल अपेक्षाकृत रंग कम पकङते हैं और बाद मैं धोने मैं आसानी रहती है….
  3. यदि संभव हो सकें तो अपने चर्म रोग विशेषज्ञ से पूछकर (बिना फीस वाला)कोई बेरियर क्रीम जरूर लगा लें अपने हाथों पर और चेहरे पर …जिसके रंग का रासायनिक प्रभाव यथा संभव कम किया जा सके…यदि बैरियर क्रीम उपलब्ध न हो तो सन स्क्रीन तो जरूर लगा लें …क्यों कि ये भी एक प्रकार की कोटिंग त्वचा पर करती है जिससे थोङा बहुत बचाव इससे भी किया जा सकता है …
  4. Hin_Holi_c-27चलो अब ये भी मान लें कि आप को किसी ने खूब रगङ के रंग लगाया है…..तो …होली खेलने के बाद चेहरे को साबुन के बजाय किसी  अच्छे से फैश वाश से धोयें….हो सकता है आप का रंग अच्छी तरह से साफ न हों पर फिर भी आपको रगङ के हरगिज इसे साफ नहीं करना है….क्यों कि इससे आपकी त्वचा को ज्यादा नुकसान होगा….वो रसायन जो अब तक आपकी त्वचा के ऊपर ही लगा हुआ था त्वचा मैं रगङ के साथ वो अंदर भी चला जायेगा और फिर पक्का ही रियैक्शन करेंगा…..

ये कुछ सावधानियां है जिनका ध्यान रखकर हम अपनी त्वचा को काफी हद तक सुरक्षित रख पायेंगे…..

Saturday, February 6, 2010

vitiligo याने सफेद दाग एक सामान्य जानकारी

सफेद दाग जिसे की आयुर्वेद मै श्वेत कुष्ठ के नाम से जानते है एक ऐसी बीमारी है जिससे कोई भी व्यक्ति बचना चाहेगा..इस बीमारी मैं व्यक्ति की त्वचा पर सफेद चकते बनने प्रारंभ हो जाते है ..और कई वार यह पूरे पूरे शरीर पर फैल जाती है…..वैसे विटिलिगो नामक इस बीमारी का कुष्ठ रोग से कोई लेना देना नहीं है.जहां कुष्ठ रोग का प्रमुख लक्षण ही त्वचा मैं संवेदना खत्म होना या सूनापन होना होता है…वहीं त्वचा मैं से रंग का अनुपस्थित होना कभी कभार ही होता है बल्कि अधिकतर बार त्वचा सामान्य रंग की ही होती है……

definition-vitiligo is an acquired idiopathic disorder characterized by circumscribed depigmented macules and patches.functional melanocytes disappear from involved skin by a mechanism that has yet not been defined.

अर्थात विटिलोगो एक ऐसी व्याधी हे जिसमें शरीर पर एकदम सफेद चकते बन जाते है ये चकते त्वचा मैं मिलेनोसाईट्स जो कि त्वचा मैं रंग बनाने के लिए जिम्मेदार होते है उनकी अनुपस्थिति की वजह से होती है पर मिलेनोसाईट्स क्यों त्वचा से अनुपस्थित होती है इसके बारे मैं अलग अलग सिद्धांत जरूर हैं पर अधिकारिक रूप से नहीं कहा जा सकता है कि क्यों ऐसा होता है.

मिलेनोसाईट्स के नष्ट होने के अनेक प्रकार के कारण खोजे गये है ….पर जिस कारण को आधार मानकर उपचार किया जाता है और जो सबस मह्तव पूर्ण कारण माना गया है वो है….autoimmune destruction of melanocytes अर्थात शरीर के प्रतिरोधक तंत्र मैं त्रुटी की वजह से मिलेनोसाईट्स का नष्ट होना.

clinical features-विटिलिगो मैं जो निशान बनता है …वह पूरी तरह से मिलेनोसाईट्स से रहित होता है इसलिए यह एक सुस्पष्ट सीमाओं वाला सफेद दूध(milky white or ivory white colored) जैसा सफेद निशान होता है.यह शरीर के किसी भी हिस्से मैं हो सकता है…पर अधिकतर यह त्वचा के वे भाग जिनका रंग आस पास की त्वचा से गहरा होता है वहां सबसे पहले प्रारंभ होता है….जैसे चेहरे पर ये अधिकतर आंखो के चारों ओर प्रारंभ होता है…या फिर वे स्थान जहां सबसे ज्यादा रगङ लगने की संभावना होती है या चोट लगती है अर्थात traumatic sites over body  जैसे कुहनी.घुटना,टखना..या कमर पर नाङा बांधने की जगह….

ये निशान एक से लेकर अनेक तक कितनी भी संख्या मैं बनने के बाद धीरे धीरे आकार मैं बढते चले जाते हैं…बढने की गति इसके प्रकार पर निर्भर करती है…और यदि ध्यान नहीं दिया जाये तो कई बार ये पूरे शरीर के ऊपर फैल सकती है.

vitiliugo को इसके होने के प्रकार के आधार पर अनेक भागों मैं बांटा गया हैं….जिसमें दो प्रमुख प्रकार माने गये हैं- vitiligo_1_010205

  • unilateral-जो कि शरीर के मध्य यदि एक रेखा खींचें तो बीच की रेखा को पार न करे.
  • and bilateral याने जो शरीर के दोनों तरफ हो सकता है.

एक अन्य प्रकार जिसमें विटिलिगो को तीन प्रकार मैं बांटा गया है

  • localized-जो शरीर के एक थोङे से हिस्सें मैं हो…
  • generalized-याने जिसमें छोटे छोटे चकते शरीर के अधिकांश हिस्सें मैं हो….करीब 90 प्रतिशत तक विटिलिगो जो हैं इसी प्रकार का होता है.
  • universal-जिसमें शरीर पर चकते न बनकर पूरा शरीर ही करीब करीब सफेद हो जाता ह.

इसके अलावा भी विटिलोगो को इसकी गति के आधार  पर दो भागों मैं बांटा गया है

prograssive-जब विटिलिगो तेजी से बढ रहा होता है.

stableजब विटिलिगो की बढत रूक गई है…

उपचार----उपचार करने मैं दो तरह की औषधिया काम मैं ला जी जाती है…एक वे जो  जो प्रति रोधक तंत्र मैं फेरबजल कर के     व्याधी के बढने को रोकती है….और दूसरी वे जो गये हुए रंग को वापिस बनाती है …..

  • narrow band uvb therapy- Ultraviolet (UV) light विध्युत चुंबकीय किरणें है जिनका तरंग दैर्ध्य प्रकाश की  दिखने वाली किरणों से कम और एक्स रे से ज्यादा होता है.

    pp1

    चूं कि इनका तरंग दैर्ध्य प्रपकाश के स्पैक्ट्रम मैं दिखने वाली violet याने बैंगनी किरणों के तरंग दैर्ध्य से छोटा होता है इसलिए इनका नाम Ultraviolet (UV)  किरणें है.UV-B(280-315nm waveband )की प्रकाश किरणें होती है.narrow band uvb therapy मैं एक विशेष प्रकार कै प्रकाश स्त्रोत से 310 nm की किरणें निकलती है….इसका विटिलिगो के निशान पर बहुत ही अच्छा प्रभाव होता है और रंग वापिस आने लगता है.सामान्यतया प्रारंभ मैं 250 मिलीजूल प्रति सैंमी की डोज मैं ये दी जाती है इसके बाद हर बार इससे करीब 10 –20 प्रतिशत तक  इसे बढाया जाता है.ये उपचार सपताह मैं 2 से तीन बार तक किया जाता है.   क्यों कि इस उपचार मैं मुंह से किसी प्रकार की औषधी बिना दिये भी किया जा सकता है इसलिए इसे 6 साल के बच्चे से लेकर बङों तक विटिलिगो के उपचार मैं इस प्रथम पंक्ति का उपचार(drug of choice) माना गया है.ये उपचार हालांकि थोङा महंगा अवश्य है…क्यों कि इस तरह के विशेष प्रकाश स्त्रोत की कीमत हजारों से लाखों रूपये तक होती है.Vitiligo_1_030314
  • PUVA therapy-PUVA याने psoralene +UVA therapy.इस उपचार मैं एक विशेष प्रकार की दवाई जिसे की psoralene कहते हैं वह दी जाती है…..ये औषधी खाने और लगाने दोनों ही प्रकार से दी जा सकती है    उसके कुछ समय बाद UVA दिखाई जाती है …..मिलेनोसाईट्स के रंग बनाने मैं uva ये psoralenes की उपस्थिति एक उत्प्रेरक का काम करती है.और रंग बनना प्रारंभ हो जाता है. जैसा कि पास मैं बने हुए चित्र मैं दिखाया  गया है उपचार के दौरान जब वापिस रंग बनना प्रारंभ होता हैं तो वो हमेशा यह बालों की जङों से ही निकलता है.

स्टीराईड्स-प्रेडिनिसोलोन,बीटामेथासोन,मिथाईल प्रेडिनिसोलोन आदि अनेक औषधियां जो कि स्टीराईड ग्रुप मैं आती है…ये विटिलोगो मैं बङी ही उपयोगी है.पर इनके साईड इफैक्ट्स ज्यादा होने की वजह से इनका प्रयोग किसी विशेषज्ञ द्वारा ही किया जाये तो ठीक रहता है.

स्टीराईड्स कई प्रकार से दी जा सकती है जैसे प्रतिदिन,या मिनिपल्स थैरेपी जैसे सप्ताह मैं लगातार दो दिन या फिर महिने मैं दो या तीन दिन तक जिसे पल्स थैरेपी कहते हैं.मिनि पल्स या पल्स थैरेपी मैं सामान्य से चार से दस गुणा तक औषधी को दो या तीन दिन मैं दे दिया जाता है और वो भी चिकत्सक की देख रेख मैं ….कई सारे अध्ययनों से ये सिद्ध हुआ है कि प्रति दिन स्टीरायड देने की बजाय पल्स या मिनिपल्स थैरेपी से स्टीरायड देने से साईड इफैक्टस काफी हद तक कम हो जाते है.पर उनसे होने वाले लाभ मैं कोई कमी नहीं आती है.

स्टीरायड औषधियां क्रीम के रूप मैं लगाने के भी काम मैं ली जा सकती है.इसके अतिरिक्त भी टैक्रोलिमस,लिवैमिसौल आदि अनेक औषधियां हैं जो इसके उपचार मैं काम मैं ली जाती है .

शल्य चिकित्सकीय उपचार-जब विटिलिगो कई दिन उपचार करने के बाद भी ठीक नहीं हो रहा होतो ये तरीके काफी कारगर सिद्ध हो सकते हैं.शल्य चिकित्सकीय उपचारों मैं स्प्लिट थिकनैस स्किन ग्राफ्टिंग.पंच ग्राफ्टिंग,आदि अनेक तरीके हैं जिनका यहां सिर्फ नाम जानना ही पर्याप्त हैं….या फिर कभी मौका लगा तो इसके बारे मैं जानकारी देंगे.

उपसंहार-कुल मिलाकर यह एक ठीक होने लायक बीमारी है…लाईलाज नहीं है…और यदि सही समय पर उपचार प्रारंभ किया जाये तो इसमें अच्छे परिणाम मिलते हैं….पर ये बात हमेशा याद रखें कि उपचार के बाद ये वापिस कभी भी हो सकती है…और कई बार नहीं भी होती है…पर ये निश्चत है कि इसका उपचार संभव है…..

Thursday, October 2, 2008

सोरायसिस(psoriasis)

विश्व की कुल जनसंख्या का करीब 1 प्रतिशत लोग सोरायसिस से पीङित हैं,इस लिहाज से देखा जाये तो हमारे देश की कुल जनसंख्या का लगभग 1 प्रतिशत याने 1 करोङ लोगों को सोरायसिस है.


सोरायसिस के बारे में जानना ही इसका आधा उपचार है यदि आप इस रोग के बारे में जानते हैं तो आधा उपचार तो आप स्वयं ही कर सकते ,


कि सामान्य जानकारी के लिए इसकी गहराई में जाना आवश्यक नहीं है यहां हम केवल उन चीजों के बारे में बात करते हैंजो एक सामान्य रोगी के लिए जानना आवश्यक है्.


लक्षण-most characteristically lesions are chronic sharply demarcated dull red scaly plaques particularly on the extensor prominence and scalp.


2906702964_301d9ea35b 2905865403_8c22f65734अर्थात रक्तिम ,छिलकेदार ,निशान जो के आस पास की त्वचा पर अलग से दिखाइ देते हैं,ये सिर अलावाextensor surface जैसे कोहनी ,और घुटने की तरफ पूरे पाव में और कमर पर अधिकतर मिलते हैं.इनका आकार 2-4 मिमि से लेकर कुछ सेमी तक हो सकता है ,सिर में ये रूसी के गंभीरतम रूप की तरह दिखाइ देते हैं,


सोरायसिस यदि एक बार हो गया तो बह फिर जीवन भर चल सकता है .विज्ञान के इतने विस्तार के बाद भी अभी तक कोइ दवाई ऐसी नहीं बनी जो इसे पूर्णतया ठीक कर सके.पूर्णतया लगभग 10-30 प्रतिशत रोगी कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाते हैं.पर इसमें उपचार की भूमिका नगण्य है ,अर्थात अपने आप ठीक होते हैं क्यों ठीक होते है ,अभी तक कारण अज्ञात है.


गंभीरता के अनुसार यह शरीर पर कई बार सिर्फ कुछेक चकतों के रूप में दिखाई देता है वे भी कुछ समय रहकर अपने आप ठीक हो जाते है ,पर बहुत बार यह शरीर के काफी बङे हिस्से को ढांप लेता है, सोरायसिस की गंभीरता मौसमी परिवर्तनों सेभी प्रभावित होती है ,जैसे सर्दियों मै सोरायसिस बढ जाता है


प्रकारक्रोनिक प्लाक सोरायसिस-यह सोरायसिस का मुख्य प्रकार है और उपर लिखित लक्षण क्रोनिक प्लाक सोरायसिस के ही हैं,


इसके अलावा इसके अन्य कई प्रकार हैं जो कि कम ही मरीजों मैं पाये जाते हैं जैसे --


guttate psoriasis-4-5 मिमि के गोल निशान बनते है ,अक्सर बच्चों मैं गले के संक्रमण के बाद होते हैं और पूरे शरीर पर गोल गोल निशान बनते है जो कि अधिकतर ठीक हो जाते हैं पर कई बार ये क्रोनिक प्लाक सोरायसिस मैं परिवर्तित हो सकते हैं


,erythrodermic psorisis-जब सोरायसिस शरीर के 80 प्रतिशत हिस्से तक फैल जाता है तो इसे कहते हैं,यह एक प्रकार का गंभीरतम प्रकार है जिसका तुरंत किसी विशेषज्ञ से उपचार की आवश्यता होती है अन्यथा जीवन के लिए खतरा हो सकता है.


pustular psoriasis-यह भी गंभीर प्रकार का सोरायसिस है जिसमें पूरे शरीर पर छाले बन जाते हैं जिनमें pus भरी होती है.


कई बार यह मात्र हथेली और पगतली पर ही होता है (palmo plantar psoriasis) और जब यह सिर्फ सर मैं होता है (scalp psoriasis ).


कैसे होता है सोरायसिस-हमारी त्वचा जिस प्रकार से हमारे बाल बढते है ,जिस तरह नाखून बढते हैं वैसे ही निरंतर बनती रहती है और उतरती रहती है। और हमारे शरीर की संपूर्ण त्वचा एक महिने में पूरी बदल जाती है.पर जहां सोरायसिस होता है वहां यह त्वचा केवल चार दिन में बदल जाती है.2906711824_497fac9a0dक्यों कि यह त्वचा पूरी तरह सेmature नहीं हो पाती है इसलिए इसकी पकङ कमजार होती है ओर यह भुरभुरी सी त्वचा चांदी के छिलकों जैसी दिखती है और यदि ऊपर से इसे ग्लाम स्लाइड से रगङा जाये तो धीरे धीरे परत दर परत उतरती चली जाती है और फिर हल्की हल्की रक्त की वूंदे दिखाइ देने लगती है यह एक तरह का टैस्ट है जिसे auspitz sign कहते हैं जो बङा साधारण सा तरीका है जिससे सोरायसिस का निदान किया जा सकता है ,


उपचार-साधारणतया सोरायसिस सामान्य मॉश्चराइजर्स या इमॉलिएंट्स जैसे वैसलीन ,ग्लिसरीन.या अन्य क्रीम्स से भी नियंत्रत हो सकता है , सिर पर जब ये होता है तो विशेष प्रकार के टार शैंपू काम मैं लिया जाता हैं,सिर के लिए सैलिसाइलिक एसिड लोशन और शरीर पर हो तो सैलिसाइलिक एसिड क्रीम विशेष उपयोगी होती है.इसके अलावा कोलटार(क्रीम,लोशन,शैम्पू) diatharnol(chryosorabin bark extract ) आदि दवाइयां विशेष उपयोगी होती हैं


फोटोथैरेपी-जिसमें सूर्य की किरणों मैं पायी जाने वाली UV-A और U V-B किरणों से से उपचार किया जाता है.PUVA थैरेपी जिसमें psoralenes +UVA थैरेपी सामान्य रूप से काम लिया जाने वाला उपचार है .


जाता हैं.इसके अलावा कैल्सिट्रायोल और कैल्सिपौट्रियोल नामक औषधियों का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है पर ये इतनी महंगी हैं कि सामान्य आदमी की पहुंच से बाहर होती हैं


इसके अलावा जब बीमारी ज्यादा गंभीर हो तब मीथोट्रीक्सैट और साईक्लोस्पोरिन नामक दवाईयां भी काम ली जाती हैं पर ये सब किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की देखरेख मैं ही लेनी चाहिये,


उपसंहार-कुल मिलाकर सोराईसिस एक ऐसी बीमारी है जो एक बार यदि हो गई तो जीवन भर चलने वाली है यानि once a psoriasis patient is always a psoriasis patient. पर इतना होने के बाद भी इसकी कुछ खूबियां है भी हैं-


यह छूत की बीमारी नहीं है.


परिवार मैं अक्सर अकेले व्यक्ति को होती है बच्चों को नहीं होती है और यदि होती भी है तो सामान्य जनसंख्या के अनुपात मैं मात्र कुछ ही ज्यादा प्रतिशत मैं ऐसा होता है तो मान सकते हैं कि आनुवांशिक रूप से कभी कभार ही होती है.


अक्सर सोरायसिस के रोगी को खुजली बीमारी की तुलना मैं बहुत कम चलती है ,इससे शरीर पर निशान होने के बाद भी मरीज आराम से जी सकता है


यदि व्यक्ति किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की देख रेख मैं यान महिने दो महिने मैं एक बार किसी विशेषज्ञ से मिलता रहे तो ज्यादा परेशान नहीं होता है.


विशेषज्ञ चिकित्सक के अलावा उपचार लेना भारी पङ सकता है,क्यों कि अक्सर लोग लंबी बीमारी होने की वजह से नीम हकीमों के,और गारंटी से ठीक कर देने वालों के चक्कर मैं पङ जाते हैं, और सामान्य रूप से ये देखा गया है कि erythrodermic psorisis, या pustular psoriasis गंभीरतम प्रकार है सोरायसिस के वे इस देशी या गारंटी वाले इलाज की वजह से ही होते है क्यों कि इस प्रकार के उपचार मैं ज्यादा तर स्टीरॉइड्स का उपयोग किया जा सकता है जिनसे अधिकतर चमङी की बीमारियों मैं थोङा बहुत फायदा जरूर होता है पर सोरायसिस मैं ये विष का काम करती है,और थोङी सी बीमारी भी पूरे शरीर मैं फैल जाती है.


परहेज नाम पर मात्र मदिरा और धूम्रपान का परहेज है क्यों कि ये दोनों ही सीधे सीधे इस व्याधि को बढाते है.


कुल मिलाकर यदि हमें इस व्याधि के बारे मैं यदि हमें सामान्य जानकारी हो तो रोगी बङे आराम से सामान्य जीवन जी सकता है और जीते हैं


Thursday, December 20, 2007

जाके पैर न फटी बिवाई -----

वो क्या जाने पीर पराई.फटी एङियों के बारे में जिस भी कवि ने ये पंक्तियां लिखी हैं सत्य है, क्यों कि फटी बिवाईयों का दर्द इतना ज्यादा होता है कि जब मेरी मां इनके उपचार के लिए पिघला मोम डालती थी चिरी हुई एङियों में तो वो जलन भी कम लगती थी, सर्दी के दिनों में एङी फटना एक सर्व सामानतय समस्या है.यदि इसका कारण और निवारण के बारे में थोङी जानकारी हो तो हम बङे आराम से इस समस्या पर पार पा सकते हैं सर्दी के मौसम में हमारी त्वचा की नमी और चिकनाई कम हो जाती हो और विषेशकर पांव की त्वचा, तो क्यों कि निरन्तर जमीन के संपर्क में रहने से और भी सूखनें लगती है और फटनें लगती है और फटी हुई त्वचा से जब मिट्टी आदि अंदर जाती है तो संक्रमण हो जाता है और दर्द होनं लगता है और उसी दर्द की अभिव्यक्ती ऊपर की गई हैकि जा के पैर न फटी बिव......... उपचार---- बीमारी आपके समझ आ गई तो उपचार भी उतना ही आसान है.चिकनाई या के नमी की कमी से एङियां फटी तो चिकनाई अर्थात moisturizers का उपयोग इसका उपचार है, इसलिए पैट्रोलियम जैली,खोपरे का तेल,कोल्ड क्रीम इत्यादि अनेकानेक चीजें इसके काम ली जातीहै.थोङी बहुत समस्या हो तो इन सब चीजों से बङे आराम से काम चल जाता है पर चीरे ज्यादा हों तो कुछ विशष उपचार करना चाहिए.सबसे पहले रोज रात में सोते समय नमक के पानी से पांव धोएं (एक लीटर पानी में एक चम्मच नमक डालकर पानी को गुनगुना कीजिए)धोना क्या पानी के अंदर पांव को पांच मिनिट तक रखना है अब जो चीरे हैं उनमें gentian violet, नामक एक दवा जो कि चार पांच रूपये में किसि भी दवाई की दुकान पर मिल जाती है.चूंकि यह द्रव पदार्थ है इसलिए चीरों के अन्दर तक जाकर संक्रमण को बङी ही सफाई से खत्म कर देता है.जिससे चीरे तुरन्त ही साफ होने लगते हैं. इसके बाद salicylic acid युक्त क्रीम जो कि बाजार में विभिन्न कंपनियों की dipsalic,trivate mf ,betnovate -s आदि अनेकानेक नामों से मिलती है ,फटी एङियों में बहुत अच्छा काम करती है यह पाँव की नमी को बनाए रखने के साथ साथ रूखी त्वचा को भी साफ करती है जिसत फटी एङियां नरम होती हैं और साफ होने लगती हैं.अब एक बार ये सब ठीक होने पर साधारण पैट्रोलियम जैली से भी एङियां साफ रह सकती हैं और जरूरत पङने पर वापिस का , सेलिसाइलिक एसिड युक्त क्रीम का प्रयोग किया जा सकता है. इस प्रकार इन साधारण उपायों से हम इस दर्द भरी समस्या से छुटकारा पा सकते हैं

Wednesday, December 19, 2007

पर्नियोसिस ---सर्दियों में अंगुलियों का सूजना

पूरा उत्तर भारत कङाके की ठंह की चपेट में आया हुआ है,इन दिनों में हाथ पांव की अंगुलियों और कई बार नाक और कान में सूजन आ जाती है और लाल होकर दर्द करने के साथ साथ तैज खुजली चलती है.लगते हैं,जिसे तकनीकी भाषा में perniosis कहते हैं.
कारण और लक्षण-क्यों कि उपरोक्त वर्णित अंग यथा हाथ पांव की अंगुलियां नाक का अंतिम सिरा,और कान का विशेषकर ऊपरी किनारा रक्तप्रवाह के हिसाब से अंतिम छोर होते हैं जहां रक्त का प्रवाह वातावरण में बदलाव की वजह से काफी प्रभावित हो सकता है,
वातावरण के तापमान में कमी की वजह से रक्तवाहिकाएं सिकुङती हैं और चूंकि हाथ पांव और मुंह ढके हुए नहीं होते तो ये बहुत जल्दी इस सबसे प्रभावित होते हैं,और प्राणवायु अर्थात ऑक्सीजन की कमी से अंगुलियों में और नाक कान मैं तेज दर्द खुजली और सूजन और ललाई जाती है.और यह सब इतना असहनीय हो जाता है कि कइ बार बुरी तरह से रोता हुआ पहुंचता है.ज्यादा दिन यदि उपचार नहीं किया गया तो फिर घाव बनने लगते हैं.और संक्रमण भी हो सकता है,
उपचार व सावधानियां- सबसे बङा उपचार तो बचाव ही है.शरीर को तेज सर्दी के समय सूती या ऊनी जुराब और मफलर से ढका हुआ रखा जाये,गृहिणियां घर का काम करते समय गुनगुना पानी काम मे लें.यदि फिर भी हो जाये तो शाम को सोते समय एक लीटर पानी में एक चम्मच नमक डालकर गुनगुना कर लें और पांव को पांच मिनिट के लिए रखे और तौलिये से पोछकर फिर गुनगुने तेल की मालिश कर जुराब पहन लें,
• कुछ औषधियां इसमे बहुत कारगर होती है जैसे nifedipine जो कि प्रमुखतःउच्च रक्तचाप की औषधी है और रक्तवाहिकाओं में हल्के फैलाव के द्वारा काम करती है perniosisमें बहुत कारगर है.
• Pentoxiphylline-यह उतकों में लाल रक्त कणिकाओं को प्रवेश करने में मदद करती है, और बहुत ही प्रभावी है.
ध्यान रहे कि औषधियां सिर्फ योग्य चिकित्सकर की देख रेख में ही ली जायें

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