Thursday, October 2, 2008

सोरायसिस(psoriasis)

विश्व की कुल जनसंख्या का करीब 1 प्रतिशत लोग सोरायसिस से पीङित हैं,इस लिहाज से देखा जाये तो हमारे देश की कुल जनसंख्या का लगभग 1 प्रतिशत याने 1 करोङ लोगों को सोरायसिस है.


सोरायसिस के बारे में जानना ही इसका आधा उपचार है यदि आप इस रोग के बारे में जानते हैं तो आधा उपचार तो आप स्वयं ही कर सकते ,


कि सामान्य जानकारी के लिए इसकी गहराई में जाना आवश्यक नहीं है यहां हम केवल उन चीजों के बारे में बात करते हैंजो एक सामान्य रोगी के लिए जानना आवश्यक है्.


लक्षण-most characteristically lesions are chronic sharply demarcated dull red scaly plaques particularly on the extensor prominence and scalp.


2906702964_301d9ea35b 2905865403_8c22f65734अर्थात रक्तिम ,छिलकेदार ,निशान जो के आस पास की त्वचा पर अलग से दिखाइ देते हैं,ये सिर अलावाextensor surface जैसे कोहनी ,और घुटने की तरफ पूरे पाव में और कमर पर अधिकतर मिलते हैं.इनका आकार 2-4 मिमि से लेकर कुछ सेमी तक हो सकता है ,सिर में ये रूसी के गंभीरतम रूप की तरह दिखाइ देते हैं,


सोरायसिस यदि एक बार हो गया तो बह फिर जीवन भर चल सकता है .विज्ञान के इतने विस्तार के बाद भी अभी तक कोइ दवाई ऐसी नहीं बनी जो इसे पूर्णतया ठीक कर सके.पूर्णतया लगभग 10-30 प्रतिशत रोगी कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाते हैं.पर इसमें उपचार की भूमिका नगण्य है ,अर्थात अपने आप ठीक होते हैं क्यों ठीक होते है ,अभी तक कारण अज्ञात है.


गंभीरता के अनुसार यह शरीर पर कई बार सिर्फ कुछेक चकतों के रूप में दिखाई देता है वे भी कुछ समय रहकर अपने आप ठीक हो जाते है ,पर बहुत बार यह शरीर के काफी बङे हिस्से को ढांप लेता है, सोरायसिस की गंभीरता मौसमी परिवर्तनों सेभी प्रभावित होती है ,जैसे सर्दियों मै सोरायसिस बढ जाता है


प्रकारक्रोनिक प्लाक सोरायसिस-यह सोरायसिस का मुख्य प्रकार है और उपर लिखित लक्षण क्रोनिक प्लाक सोरायसिस के ही हैं,


इसके अलावा इसके अन्य कई प्रकार हैं जो कि कम ही मरीजों मैं पाये जाते हैं जैसे --


guttate psoriasis-4-5 मिमि के गोल निशान बनते है ,अक्सर बच्चों मैं गले के संक्रमण के बाद होते हैं और पूरे शरीर पर गोल गोल निशान बनते है जो कि अधिकतर ठीक हो जाते हैं पर कई बार ये क्रोनिक प्लाक सोरायसिस मैं परिवर्तित हो सकते हैं


,erythrodermic psorisis-जब सोरायसिस शरीर के 80 प्रतिशत हिस्से तक फैल जाता है तो इसे कहते हैं,यह एक प्रकार का गंभीरतम प्रकार है जिसका तुरंत किसी विशेषज्ञ से उपचार की आवश्यता होती है अन्यथा जीवन के लिए खतरा हो सकता है.


pustular psoriasis-यह भी गंभीर प्रकार का सोरायसिस है जिसमें पूरे शरीर पर छाले बन जाते हैं जिनमें pus भरी होती है.


कई बार यह मात्र हथेली और पगतली पर ही होता है (palmo plantar psoriasis) और जब यह सिर्फ सर मैं होता है (scalp psoriasis ).


कैसे होता है सोरायसिस-हमारी त्वचा जिस प्रकार से हमारे बाल बढते है ,जिस तरह नाखून बढते हैं वैसे ही निरंतर बनती रहती है और उतरती रहती है। और हमारे शरीर की संपूर्ण त्वचा एक महिने में पूरी बदल जाती है.पर जहां सोरायसिस होता है वहां यह त्वचा केवल चार दिन में बदल जाती है.2906711824_497fac9a0dक्यों कि यह त्वचा पूरी तरह सेmature नहीं हो पाती है इसलिए इसकी पकङ कमजार होती है ओर यह भुरभुरी सी त्वचा चांदी के छिलकों जैसी दिखती है और यदि ऊपर से इसे ग्लाम स्लाइड से रगङा जाये तो धीरे धीरे परत दर परत उतरती चली जाती है और फिर हल्की हल्की रक्त की वूंदे दिखाइ देने लगती है यह एक तरह का टैस्ट है जिसे auspitz sign कहते हैं जो बङा साधारण सा तरीका है जिससे सोरायसिस का निदान किया जा सकता है ,


उपचार-साधारणतया सोरायसिस सामान्य मॉश्चराइजर्स या इमॉलिएंट्स जैसे वैसलीन ,ग्लिसरीन.या अन्य क्रीम्स से भी नियंत्रत हो सकता है , सिर पर जब ये होता है तो विशेष प्रकार के टार शैंपू काम मैं लिया जाता हैं,सिर के लिए सैलिसाइलिक एसिड लोशन और शरीर पर हो तो सैलिसाइलिक एसिड क्रीम विशेष उपयोगी होती है.इसके अलावा कोलटार(क्रीम,लोशन,शैम्पू) diatharnol(chryosorabin bark extract ) आदि दवाइयां विशेष उपयोगी होती हैं


फोटोथैरेपी-जिसमें सूर्य की किरणों मैं पायी जाने वाली UV-A और U V-B किरणों से से उपचार किया जाता है.PUVA थैरेपी जिसमें psoralenes +UVA थैरेपी सामान्य रूप से काम लिया जाने वाला उपचार है .


जाता हैं.इसके अलावा कैल्सिट्रायोल और कैल्सिपौट्रियोल नामक औषधियों का भी बहुत अच्छा प्रभाव होता है पर ये इतनी महंगी हैं कि सामान्य आदमी की पहुंच से बाहर होती हैं


इसके अलावा जब बीमारी ज्यादा गंभीर हो तब मीथोट्रीक्सैट और साईक्लोस्पोरिन नामक दवाईयां भी काम ली जाती हैं पर ये सब किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की देखरेख मैं ही लेनी चाहिये,


उपसंहार-कुल मिलाकर सोराईसिस एक ऐसी बीमारी है जो एक बार यदि हो गई तो जीवन भर चलने वाली है यानि once a psoriasis patient is always a psoriasis patient. पर इतना होने के बाद भी इसकी कुछ खूबियां है भी हैं-


यह छूत की बीमारी नहीं है.


परिवार मैं अक्सर अकेले व्यक्ति को होती है बच्चों को नहीं होती है और यदि होती भी है तो सामान्य जनसंख्या के अनुपात मैं मात्र कुछ ही ज्यादा प्रतिशत मैं ऐसा होता है तो मान सकते हैं कि आनुवांशिक रूप से कभी कभार ही होती है.


अक्सर सोरायसिस के रोगी को खुजली बीमारी की तुलना मैं बहुत कम चलती है ,इससे शरीर पर निशान होने के बाद भी मरीज आराम से जी सकता है


यदि व्यक्ति किसी विशेषज्ञ चिकित्सक की देख रेख मैं यान महिने दो महिने मैं एक बार किसी विशेषज्ञ से मिलता रहे तो ज्यादा परेशान नहीं होता है.


विशेषज्ञ चिकित्सक के अलावा उपचार लेना भारी पङ सकता है,क्यों कि अक्सर लोग लंबी बीमारी होने की वजह से नीम हकीमों के,और गारंटी से ठीक कर देने वालों के चक्कर मैं पङ जाते हैं, और सामान्य रूप से ये देखा गया है कि erythrodermic psorisis, या pustular psoriasis गंभीरतम प्रकार है सोरायसिस के वे इस देशी या गारंटी वाले इलाज की वजह से ही होते है क्यों कि इस प्रकार के उपचार मैं ज्यादा तर स्टीरॉइड्स का उपयोग किया जा सकता है जिनसे अधिकतर चमङी की बीमारियों मैं थोङा बहुत फायदा जरूर होता है पर सोरायसिस मैं ये विष का काम करती है,और थोङी सी बीमारी भी पूरे शरीर मैं फैल जाती है.


परहेज नाम पर मात्र मदिरा और धूम्रपान का परहेज है क्यों कि ये दोनों ही सीधे सीधे इस व्याधि को बढाते है.


कुल मिलाकर यदि हमें इस व्याधि के बारे मैं यदि हमें सामान्य जानकारी हो तो रोगी बङे आराम से सामान्य जीवन जी सकता है और जीते हैं


Thursday, December 20, 2007

जाके पैर न फटी बिवाई -----

वो क्या जाने पीर पराई.फटी एङियों के बारे में जिस भी कवि ने ये पंक्तियां लिखी हैं सत्य है, क्यों कि फटी बिवाईयों का दर्द इतना ज्यादा होता है कि जब मेरी मां इनके उपचार के लिए पिघला मोम डालती थी चिरी हुई एङियों में तो वो जलन भी कम लगती थी, सर्दी के दिनों में एङी फटना एक सर्व सामानतय समस्या है.यदि इसका कारण और निवारण के बारे में थोङी जानकारी हो तो हम बङे आराम से इस समस्या पर पार पा सकते हैं सर्दी के मौसम में हमारी त्वचा की नमी और चिकनाई कम हो जाती हो और विषेशकर पांव की त्वचा, तो क्यों कि निरन्तर जमीन के संपर्क में रहने से और भी सूखनें लगती है और फटनें लगती है और फटी हुई त्वचा से जब मिट्टी आदि अंदर जाती है तो संक्रमण हो जाता है और दर्द होनं लगता है और उसी दर्द की अभिव्यक्ती ऊपर की गई हैकि जा के पैर न फटी बिव......... उपचार---- बीमारी आपके समझ आ गई तो उपचार भी उतना ही आसान है.चिकनाई या के नमी की कमी से एङियां फटी तो चिकनाई अर्थात moisturizers का उपयोग इसका उपचार है, इसलिए पैट्रोलियम जैली,खोपरे का तेल,कोल्ड क्रीम इत्यादि अनेकानेक चीजें इसके काम ली जातीहै.थोङी बहुत समस्या हो तो इन सब चीजों से बङे आराम से काम चल जाता है पर चीरे ज्यादा हों तो कुछ विशष उपचार करना चाहिए.सबसे पहले रोज रात में सोते समय नमक के पानी से पांव धोएं (एक लीटर पानी में एक चम्मच नमक डालकर पानी को गुनगुना कीजिए)धोना क्या पानी के अंदर पांव को पांच मिनिट तक रखना है अब जो चीरे हैं उनमें gentian violet, नामक एक दवा जो कि चार पांच रूपये में किसि भी दवाई की दुकान पर मिल जाती है.चूंकि यह द्रव पदार्थ है इसलिए चीरों के अन्दर तक जाकर संक्रमण को बङी ही सफाई से खत्म कर देता है.जिससे चीरे तुरन्त ही साफ होने लगते हैं. इसके बाद salicylic acid युक्त क्रीम जो कि बाजार में विभिन्न कंपनियों की dipsalic,trivate mf ,betnovate -s आदि अनेकानेक नामों से मिलती है ,फटी एङियों में बहुत अच्छा काम करती है यह पाँव की नमी को बनाए रखने के साथ साथ रूखी त्वचा को भी साफ करती है जिसत फटी एङियां नरम होती हैं और साफ होने लगती हैं.अब एक बार ये सब ठीक होने पर साधारण पैट्रोलियम जैली से भी एङियां साफ रह सकती हैं और जरूरत पङने पर वापिस का , सेलिसाइलिक एसिड युक्त क्रीम का प्रयोग किया जा सकता है. इस प्रकार इन साधारण उपायों से हम इस दर्द भरी समस्या से छुटकारा पा सकते हैं

Wednesday, December 19, 2007

पर्नियोसिस ---सर्दियों में अंगुलियों का सूजना

पूरा उत्तर भारत कङाके की ठंह की चपेट में आया हुआ है,इन दिनों में हाथ पांव की अंगुलियों और कई बार नाक और कान में सूजन आ जाती है और लाल होकर दर्द करने के साथ साथ तैज खुजली चलती है.लगते हैं,जिसे तकनीकी भाषा में perniosis कहते हैं.
कारण और लक्षण-क्यों कि उपरोक्त वर्णित अंग यथा हाथ पांव की अंगुलियां नाक का अंतिम सिरा,और कान का विशेषकर ऊपरी किनारा रक्तप्रवाह के हिसाब से अंतिम छोर होते हैं जहां रक्त का प्रवाह वातावरण में बदलाव की वजह से काफी प्रभावित हो सकता है,
वातावरण के तापमान में कमी की वजह से रक्तवाहिकाएं सिकुङती हैं और चूंकि हाथ पांव और मुंह ढके हुए नहीं होते तो ये बहुत जल्दी इस सबसे प्रभावित होते हैं,और प्राणवायु अर्थात ऑक्सीजन की कमी से अंगुलियों में और नाक कान मैं तेज दर्द खुजली और सूजन और ललाई जाती है.और यह सब इतना असहनीय हो जाता है कि कइ बार बुरी तरह से रोता हुआ पहुंचता है.ज्यादा दिन यदि उपचार नहीं किया गया तो फिर घाव बनने लगते हैं.और संक्रमण भी हो सकता है,
उपचार व सावधानियां- सबसे बङा उपचार तो बचाव ही है.शरीर को तेज सर्दी के समय सूती या ऊनी जुराब और मफलर से ढका हुआ रखा जाये,गृहिणियां घर का काम करते समय गुनगुना पानी काम मे लें.यदि फिर भी हो जाये तो शाम को सोते समय एक लीटर पानी में एक चम्मच नमक डालकर गुनगुना कर लें और पांव को पांच मिनिट के लिए रखे और तौलिये से पोछकर फिर गुनगुने तेल की मालिश कर जुराब पहन लें,
• कुछ औषधियां इसमे बहुत कारगर होती है जैसे nifedipine जो कि प्रमुखतःउच्च रक्तचाप की औषधी है और रक्तवाहिकाओं में हल्के फैलाव के द्वारा काम करती है perniosisमें बहुत कारगर है.
• Pentoxiphylline-यह उतकों में लाल रक्त कणिकाओं को प्रवेश करने में मदद करती है, और बहुत ही प्रभावी है.
ध्यान रहे कि औषधियां सिर्फ योग्य चिकित्सकर की देख रेख में ही ली जायें

Monday, November 12, 2007

राजस्थान में सरकार की तुगलकी नीतियों के कारण पिसता मरीज

कई बार सरकारें वाह वाही लूटने के लिए बिना सोचे समझे ऐसी नीतियां लागू कर देती है जिनसे अंततः फायदा होने की बजाय आम जनता को नुकसान ज्यादा होता है ,

उदाहरण के लिए राजस्थान में सरकारी चिकित्सालयों में चिकित्सकों को जैनेरिक नाम से दवाईयां लिखना अनिवार्य कर दिया गया है ,संभवतया यह डॉक्टरों को जो कंपनियां आर्थिक लाभ देती है इसके लिए किया गया था.पर इसका जो प्रभाव हुआ वह मूल रोग से भी अधिक कष्ट कारी रहा है,सबसे पहले तो सारी दवाईयों को जैनेरिक नाम से लिखा जाना संभव ही नहीं है,क्यों कि कई बार एक ही दवाई के 10-10 घटक होते हैं तो उन्हें उसकी डोज के हिसाब से लिखा जाये तो एक मरीज देखने में कम से कम 15 मिनिट चाहिअ और बाह्यः रोगी विभाग में प्रतिदिन 50 से 100 मरीज देखने वाला चिकित्सक कैसे यह कर पायेगा यह सोचने का विषय है,क्यों कि यह लगभग असंभव है,

इससे भी बङी समस्या है कि चिकित्सक ने औषधी लिख दी पर औषधी विक्रेता उसे क्या देगा वह चिकित्सक के हाथ में नहीं रहता है,आपकी जानकारी के लिए बता दूं की एक अच्छी कंपनी और एक चलताउ कंपनी के विक्रय लाभ में कई गुना का फर्क होता है और यही फर्क उनकी गुणवत्ता में भी होता है.इसलिए दुकानदारों की चांदी हो रही है क्यों कि अब यह चिकित्सक के हाथ में नहीं रह जाता कि उसके मरीज को किसी अच्छी कंपनी की अच्छी गुणवत्ता वाली औषधी ही मिले.खांसी जुकाम की तो कोई बात नहीं गंभीर रोगों से ग्रसित रोगियों का इससे क्या हाल होने वाला है ये आप कल्पना कर सकते है.मान लीजिये कोई हृदय रोगी या मधुमेह या के कोई लकवे से ग्रस्त रोगी की औषधियों की गुणवत्ता विश्वसनीय नहीं हो तो चिकित्सक किस तरह रोगी का उपचार कर पायेगा.आश्चर्य की बात तो यह है कि यह नियम जिला चिकित्सालय से लेकर आयुर्विज्ञान महाविद्यालय तक लागू है तो आप सोचिये गंभीर रोगियों का क्या हाल होता होगा.

सरकार की मंशा तो पता नहीं क्या रही होगी पर फिलहाल तो सरकार इस नियम को सख्ती से लागू कर रही है और नहीं मानने वाले चिकित्सकों के निलंबन से लेकर स्थानांतरण तक सरकार कर रही है.चिकित्सकों की तो वो जाने पर मरीजों का हाल तो भगवान भरोसे ही है.

Sunday, November 4, 2007

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Wednesday, October 31, 2007

जूँ

 

जूँएं एक 3-4  mm  का छोटा सा कीट है  जो तीन प्रकार की होती है

  1. pediculosis humanus capitis -इसका जीवन काल करीब 40 दिनों का होता है,और अपने जीवन काल में ये 400 के आस पास अंडे देती है,याने प्रतिदिन 7-10 .ये अंडे जिन्हें हम लीख के नाम से जानते है.ये लीख अब एक चिपकाने वाले पदार्थ से बाल से चिपक जाती है,अंडा  अब 8 दिन में पककर अगले 10 दिन में पूरी जूँ बन जाती है और उसके बाद ये जो धमाचौकङी करती है तो हम सब कूदने लगते है
  2. pediculosis humanus humanus--यह शरीर पर पाई जाने वाली जूँ है ,इसका अंडा मानव शरीर पर न रहकर कपङे के रेशों के साथ चिपका रहता है.ऊपर से देखने पर यह बालों की जङों में घुसी हुई दिखती है.यह भी जबरदस्त खुजली का कारण है.चूंकि यह कपङों से जुङी रहती है इसलिये जो लोग एक दूसरे के कपङे पहन लेते हैं उनमें ये ज्यादा होती है.
  3. pthiris pubis -- मुख्यतया पेडू के नीचे वाले हिस्से में ये होती है,(pubic area)इसके अतिरिक्त ये ,काख ,आंख कीभौहों ,पलकों आदि को भी प्रभावित कर  सकता है,

जूँ किसी भी प्रकार की हो इसका मुख्य लक्षण खुजली चलना है ,और कई बार खुजली इतनी ज्यादा होती है कि खुजली करने से घाव हो जाते हैं.12-13 साल से ऊपर के बच्चे और खासकर लङकियां जिनमें बार बार सिर में फोङे फुंसियां होते हैंउनमें अधिकतर में जूँएं ही प्रमुख कारण होती हैं.परिवार में एक व्यक्ति के जूँ होने पर सब लोगों के होने की आशंका रहती है इसलिए जल्दी से जल्दी इनका उपचार करना चाहिए.

उपचार--- उपचार में पहले तो यदि किसी प्रकार के फोङे फुंसी हो रहें हैं तो पहले एंटीबायॉटिक द्वारा उसका उपचार किया जाता है,उसके बाद ही जूँओं की कोई दवाई लगानी चाहिए.जूँऔं के उपचार के लिए gamma banzene hexachloride नामक औषधी जो कि दवाई की दुकान पर ascabiol,scabimide,GBHC,आदि नामों से मिलती हैं इसके अलावा   permethrine 1 % जो की perlice, permite,permaridआदि नामों से मिलती है.इनमें से की यदि इनमें से नीचे रेखांकित औषधियां विश्व के हर देश जैसे अमेरिका ,इंग्लैंड हो या हिंदुस्तान सभी जगह इसी नाम से बिकती है.

दवाई को जो की क्रीम या लोशन के रूप में होती है उसे हाथ में लेकर सिर में या शरीर पर हैं तो प्रभावित स्थान पर दवाई लगाकर करीब 2 घंटे तक रखें.हो सके तो सिर में कपङा बांध लें.2 घंटे बाद सिर को किसी साधारण शैंपू से अच्छी तरह से धो लें और कंघी कर लें सारी जूंएं कंघी के साथ लगकर बाहर निकल जाएँगी एक साथ.अब चूंकी दवाई लगने से मात्र जीवित जूँएं ही साफ होती है सप्ताह भर में लीखं जूँएं बन जाती हैं तो सप्ताह भर बाद एक बार फिर से यह प्रक्रिया दोहरानी चाहिये.

सावधानियां--

  1. परिवार में जितने लोगों को जूँएं हैं सब का उपचार एक साथ हो.
  2. कपङे बिस्तर आदि धूप में लगाएं या गर्म पानी में धोँएं
  3. गर्भवती महिला या एक साल के छोटे बच्चे में gamma banzene hexachloride काम में न लें
  4. ये औषधियां सुरतक्षित तो हैं पर विषैली भी हैं इसलिए आंखों से और मुंह से बचाव करके ही लगाई जाएं
  5.  और ठीक हो जायें तो चिकित्सक को धन्यवाद दिया जाये.

जूँ --शायद ये आज तक की किसी भी पोस्ट का सबसे छोटा शीर्षक होगा ,पर इससे बङा हो भी नहीं सकता था, 

Monday, October 29, 2007

ये समाचार चैनल या पंचकूटे की भाजी...

फळी, काचरा,टमाटर.मिर्ची,कमल गट्टा,सांगरी,टिंडे,भिंडी याने बची खुची सारी सब्जियों का बङा स्वादिष्ट मिश्रण जिसे राजस्थान में  पंचकूटे की भाजी कहते हैं बहुत ही स्वादिष्ट होती है पर कोई ये पूछे की उस भाजी में सही सही क्या है,या कि किस चीज की भाजी है तो बताना मुश्किल है.वैसे ही यदि  यह देखा जाये कि आज तक या के स्टार न्यूज या के जी न्यूज या के ................क्या हैं.... समाचार चैनल है.......शायद ,मनोरंजन चैनल है.सोचना पङेगा,खेल चैनल है.....पता नहीं.क्यों कि यदि दैश में कोई महत्व पूर्ण घटना घटित हुई और आप टी वी चालु करके देखिये किसी पर नच बलिए कहीं सास बहु के सीरियलों का घटिया सा चूं चूं का मुरब्बा जैसा कोई प्रोग्राम,या फिर नित रोज होने वाले किसी फिल्मी स्टेज कार्यक्रम की झलकियां ही देखने को मिलती है.पता नहीं या तो इन्हे अपनी प्रतिभा पर भरोसा नहीं या देश की जनता को निरी बेवकूफ समझ रखा है,भई इन सब बातों में सर खपाने की बजाय यदि कोई ढंग का सा वृत्त चित्र भी दिखायें तो ,याके कोई वार्ता .पर नहीं अरे भाई हमारी नहीं तो अपनी इज्जत का तो ख्याल करो आप लोग पत्रकार हो यार.

याद आते हैं वे दिन जब अपनी बैठक में बैठकर हम दैश के हर अभयारण्य मे घूम लेते थे,या देश की शिक्षा व्यवस्था पर धीर गंभीर चिंतन सुनते थे.पर आजकल  कभी परिचर्चा दिखायी भी तो आने वाला मेहमान विद्वान कम विवादित ज्यादा होता है.पर कोई उपाय नहीं तब तक समाचार जानने हों तो दूसरे दिन के समाचार पत्र की प्रतीक्षा करो और तब तक पंचकूटे की सब्जी खाओ,